मैं मुक्तेश्वर क्षेत्र को माउंटेन साइक्लिंग के लिए बढ़ावा देना चाहता हूं: राकेश राणा

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“मुझे पता था कि एक पेशेवर साइकिल चालक के रूप में मैं अपनी आजीविकी हमेशा नहीं चला पाउँगा। और यह अभी मुझे परिवार, साइकल रेस में भाग लेने के लिए पर्याप्त पोषण, महंगी साइकिल और सामान पर पैसे खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसे भी नहीं कमा पाउँगा।” 29 वर्षीय राकेश राणा, राष्ट्रीय स्तर के एक पेशेवर पर्वतीय साइकिल चालक, उत्तराखंड के नैनीताल, सतखोल गांव में स्थित अपने साइकिल-थीम वाले कैफे में कहते हैं।

भले ही राणा ज्यादा पढ़ाई नहीं कर सके हों, लेकिन वे हमेशा ख़ुद का काम शुरू करना चाहते थे। वह याद करते हुए बताते हैं कि 12वीं पास करने से पहले वे अक्सर परिवार की आय बढ़ाने के लिए एक मजदूर के रूप में काम करते थे। इसी कारण उन्होंने गाँव की मुख्य सड़क किनारे एक छोटा सा जनरल स्टोर और एक चाय स्टाल भी खोला।

लेकिन 2012 में गैर-सरकारी संगठन आरोही द्वारा आयोजित एक साइकिल दौड़, जिसमें उन्होंने अपने चचेरे भाई कमलेश राणा के साथ हिस्सा लिया, ने उनका जीवन बदल दिया। “मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं पेशेवर रूप से साइकिल चलाऊंगा,” वे याद करते हैं।

हालांकि, जैसा कि वह पहाड़ियों में रहता है, राणा का शारीरिक रूप से फिट रहने और खेल में सक्रिय रहने पर जोर हमेशा से था ताकि उसे सेना में नौकरी मिल सके। रेस को कमलेश ने जीता और राकेश ने अपनी श्रेणी में तीसरा स्थान प्राप्त किया।

कमलेश को इनाम के रूप में एक पहाड़ी रेस की साइकल मिली जिसे राकेश ने भी इस्तेमाल किया। इस अभ्यास का परिणाम यह हुआ कि अगले वर्ष की रेस में राणा और कमलेश दोनों ने अपनी श्रेणियों में दौड़ जीती। लेकिन इस वर्ष पुरस्कार के रूप में आरोही ने उन्हें आठ दिनों के गहन प्रशिक्षण के लिए बैंगलोर भेजा जिसमें उन्होंने 1000 किमी से अधिक दूर तक साइकिल चलाए। “मैंने प्रशिक्षण और प्रोत्साहन प्राप्त करने के बाद पेशेवर साइकल चालक बनने के लिए गंभीर रुचि लेना शुरू किया। आज, सभी राष्ट्रीय आयोजनों में भाग लेने के अलावा, मैंने भूटान और नेपाल में अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लिया है। और इन सभी प्रतियोगियाओं में मैंने पोडियम को जगह बनायी है,” गर्व से राणा बताते हैं। राणा पहले भारतीय हैं जिन्होंने जिन्होंने भूटान के टूर ऑफ़ द ड्रैगन जो की 255 किमी लंबी चार से अधिक पहाड़ों से गुज़रने वाली एक दिवसीय अल्ट्रा-मैराथन माउंटेन बाइक रेस है, में शीर्ष 10 प्रतियोगियों में जगह बनायी थी।

राणा ख़ुद को भाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें परिवार के सभी लोगों ने प्रोत्साहित किया। “किसी ने भी मुझे सेना में नौकरी के लिए आवेदन करने के लिए मजबूर नहीं किया। हमें इस बात से मदद हुई कि हम बैंगलोर का टिकट और अपने एक अच्छी साइकल अपने दम पर नहीं ख़रीद सकते थे।”

इस प्रोत्साहन के परिणामस्वरूप, उन्होंने 2015 में पूर्णकालिक रूप से साइकिल चलाना शुरू कर दिया। पूरे समय उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति और इस बात को ध्यान में रखा की एक पेशेवर के रूप में वो हमेशा पैसे नहीं कमा पाएँगे।

2016 में, राणा एक साइकिल प्रतियोगिया में भाग लेने के लिए मनाली गए जहां वह एक कैम्प में रहे। इस अनुभव ने उन्हें अपने गांव में एक साइकिल की थीम वाले कैफे को खोलने का विचार दिया। इस विचार को उनके साइकिलिस्ट दोस्तों ने तुरंत समर्थन दिया था और इस कैफ़े को बढ़ावा देने का भी वादा किया। इसके परिणामस्वरूप राणा ने 2017 में कैंप ग्रीन्स की स्थापना की जो की एक पर्यावरण के अनुकूल कैफे है जहां साहसिक गतिविधियों जैसे कि माउंटेन साइकिलिंग, ट्रेकिंग आदि की सुविधा उपलब्ध है। इस कैम्प को स्थापित करने का शुरुआती खर्च 4 लाख रुपये था, जो साइकिल से हुई कमाई और परिवार और बाहरी लोगों से उधार लेकर पूरा किया गया था।

हालांकि, राणा ने जल्द ही महसूस किया कि कैम्प साल भर भरा नहीं रह सकता है और अपने रिश्तेदारों, जो की शिविर में काम कर रहे थे, उन्हें व्यस्त रखने के लिए उन्होंने चाय, कॉफी, मोमोज, बन-आमलेट और मैगी बेचने के लिए, मुख्य सड़क पर अपने जनरल स्टोर के ऊपर, एक साइकिल की थीम वाले कैफे की स्थापना की।

चूंकि राणा पूरी तरह से पेशेवर साइकिल पर ध्यान दे रहे थे वे कैम्प और कैफे के विस्तार के लिए विपणन और सोशल मीडिया के प्रचार आदि समस्याओं से जूझ रहे थे। इसी बीच उन्हें जीवन डंगवाल और शुभ कबाड़वाल (प्रथम समूह से दोनों उद्यमी) से उद्यम के उद्यमशीलता के कोहोर्ट के बारे में पता चला। उद्यम ने 2018 में कोहोर्ट की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य ना सिर्फ़ आर्थिक मदद बल्कि परामर्श भी प्रदान करता है।

“उद्यम ने मुझे सिखाया कि कैसे काम करना है। उन्होंने मुझे विपणन के अलावा, लेखांकन सिखाया जिससे मुझे व्यवसाय को बेहतर तरीके से देखने में मदद मिली। उन्होंने मुझे लोगों से भी मिलवाया ताकि मैं उनके अनुभवों से सीख सकूं।”

उद्यम के साथ जुड़ाव ने उन्हें अपने लिए ख़रीदी गयी साइकिलों को किराए पर देने के व्यवसाय को भी शुरू करने का विचार दिया। आज वह छह पेशेवर साइकलों को किराए पर देते हैं। राणा कहते हैं, “मुझे कैफ़े चलाना सीखने के लिए भीमताल के बर्डसॉन्ग कैफे में भी भेजा गया था।”

राणा, जो नैनीताल जिले के पहले ऐसे पेशेवर साइकिल चालक है जिन्होंने ना सिर्फ़ प्रतियोगिताओं में भाग लिया बल्कि पोडीयम में स्थान भी प्राप्त किया था, आज पांच युवाओं का मार्गदर्शन कर रहें है। पहाड़ के प्रतिभाशाली साइकल चालक और मुक्तेश्वर क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए, वह नियमित रूप से मिनी-मैराथन और साइकिलिंग का आयोजन करते हैं। 26 जनवरी 2020 को भी, जिस दिन हम उनसे मिले, उन्होंने एक प्रतियोगिता आयोजित की थी। राणा कहते हैं, “यह सब मुझे अपने कैम्प का ऑक्यूपेंसी रेट बढ़ाने और कैंप को बढ़ावा देने में भी मदद करता है।”